शाम ढले, चिराग जले ग्राहक की तालिब एक बाई सड़क पर खड़ी है। संभावित ग्राहक उसके करीब आता है, उससे अपेक्षित सवाल करता है, बाई कहती है – पाँच हजार, आठ हजार, दस हजार या जिस के भी काबिल वो हो। ग्राहक को रेट कुबूल है तो वाह वाह! दोनों राज़ी। नहीं कुबूल तो चलता किया जाता है। इस का निचोड़ ये है कि बाई पैसे के लिए अपनी जिस्मानी खिदमात फरोख्त करती है, उसमें मुलाहज़े की कोई जगह नहीं। एक लेखक है, उसको किसी लिटरेरी फेस्टिवल में शिरकत का न्योता मिलता है जिसमें शामिल होता है – एयर-फेयर, फाइव-स्टार-होटल स्टे, पिक अप एण्ड ड्रॉप फ्रॉम एयरपोर्ट, जमा बाकी खिदमात जो हास्पिटैलिटी बिजनेस का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं। लेखक पूछता है पैसा कितना मिलेगा। पसंदीदा जवाब नहीं मिलता है तो कहता है, नहीं आ सकता, किसी दूसरे लेखक को बुला लो, उसकी जेहनी खिदमात फीस बिना – इज्जतदार लफ़्ज़ ‘मानदेय’ – उपलब्ध नहीं हैं। क्या फर्क है ऊपर दर्ज दो मिसालों में? खाकसार की निगाह में कोई फर्क नहीं। एक का स्टॉक-इन-ट्रेड जिस्म है, दूसरे का जेहन है। मंजूरशुदा, मनमाफिक कीमत अदा किये बिना दोनों ही हासिल नहीं। फर्क सिर्फ ये है कि बाई जो करती है किसी शौक की खातिर नहीं करती, जरूरत के, मजबूरी के तहत करती है। जबकि लेखक की ऐसी कोई जरूरत, कोई मजबूरी उजागर नहीं क्योंकि कहता है, दावा ठोक […]
बेबाक
मैं बहुत शर्मसार हो कर कुबूल करता हूं कि ‘छमाही तीस लाख रॉयल्टी’ प्रकरण से पहले मैंने कभी वयोवृद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ल का नाम नहीं सुना था, न ही मैं उनके (अब) प्रसिद्ध उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के नाम से वाकिफ था। रायपुर पुस्तक मेले में पुस्तक के मौजूदा प्रकाशक ने एकाएक एक ड्रामा स्टेज किया जिसकी बदौलत मेरे जैसे कई – मैं खास तौर से – नादान पाठकों ने जाना कि लेखक कितने मकबूल थे, उनका लेखन कितना मकबूल था। फ़ेस-बुक पर ‘हिन्द युग्म सुपर शो’ का ऐसा वसीह चर्चा दिखाई दिया जैसे कि ट्रम्प ने भारत पर टैरिफ ज़ीरो पर्सेन्ट कर दिया था। हिन्दी के लेखक को यूं महिमामंडित होने का सुख प्राप्त हुआ, ये तमाम हिन्दी प्रेमियों के लिए अत्यंत हर्ष का विषय है। हम दुआ करते हैं कि अगली छमाही का ऐसा चेक भी इतने ही बाजे-गाजे के साथ लेखक को प्राप्त हो, हिन्द युग्म से प्रकाशित अन्य किसी लेखक को भी प्राप्त हो, ताकि शुक्ल जी तीस-लखटकिया क्लब के इकलौते चार्टर्ड मेम्बर बन कर न रह जाएं। मैं नहीं जानता कि आम पाठक प्रकाशक द्वारा प्रदत्त ‘एडवांस’ और ‘रॉयल्टी’ में फर्क महसूस करता है या नहीं, अलबत्ता मेरी कमअक्ली जो बयान करती है वो ये है कि ‘रॉयल्टी’ लेखक का हक है, क्योंकि वो लेखक को उसका अधिकारी बन के दिखा चुकने के बाद मिलती थी। […]
‘वर्दी वाला गुंडा’ की आठ करोड़ प्रतियां बिकीं। पहले ही दिन पंद्रह लाख प्रतियां बिकीं। ये दो बहुत बड़े दावे हैं जिनको मैं सालों से सुनता आ रहा हूँ। और सुनने वाला मैं अकेला भी नहीं हूँ। मेरे अलावा न्यूजहाउन्ड हैं जो ऐसी न्यूज को कारोबारी अंदाज से भी लपकते हैं और मुसाहिबी अंदाज से हवा देना भी अपना फर्ज समझते हैं। हैरानी की बात है कि कभी किसी ने लेखक के दावे पर सवाल नहीं किया, ऐतराज नहीं जताया – न उसकी ज़िंदगी में, न सन् 2017 में उसके न रहने के बाद – कि ये मुमकिन नहीं, दिस डज़ नॉट स्टैंड टु रीज़न, फिर भी अगर लेखक का ऐसा दावा था तो उसे प्रमाणिकता की जरूरत है। लेकिन मैंने नहीं सुना कि कभी किसी ने इस बाबत कोई सवाल किया हो। सबने लेखक के कथन को ‘सतबचन महाराज’ कह कर कुबूल किया वरना ये स्थापित करना कोई कठिन काम नहीं कि जो कहा जा रहा था, वो नामुमकिन था। बहुत से दावे ऐसे होते हैं जिनको झूठा या नामुमकिन साबित करने के लिए किसी सुबूत की जरूरत नहीं होती। जैसे मैं कहूँ कि मेरा कद दस फुट है तो ‘नहीं हो सकता’ कहने से पहले कोई कद नाप के नहीं देखेगा। मैं कहूँ कि मेरी उम्र एक सौ बीस साल है तो मुझे झूठा करार देने के लिए ‘प्रूफ ऑफ एज’ की मांग […]