सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथात्मक शृंखला — ‘न बैरी न कोई बेगाना’, ‘हम नहीं चंगे बुरा न कोई’, ‘निंदक नियरे राखिए’ और ‘पानी केरा बुदबुदा’ — हिन्दी साहित्य में आत्मकथा लेखन का मानक स्थापित कर चुकी है। यह केवल एक लेखक की जीवनी नहीं, बल्कि उस युग का साक्ष्य है जिसमें हिन्दी साहित्य, प्रकाशन-जगत और पाठक संस्कृति ने परिवर्तन के असंख्य आयाम देखे।
अब प्रस्तुत है इस गाथा का पाँचवाँ भाग — “एक सीस का मानवा” — जो पाठक साहब के जीवन के हालिया वर्षों को रचनात्मक और मानवीय दृष्टि से खोलता है। इसमें वे अपने अनुभवों, मुलाक़ातों, आत्ममंथन और बदलते समय के साथ अपने संबंधों की पड़ताल करते हैं। लेखक का आत्मविश्लेषण यहाँ एक सच्चे साधक की तरह सामने आता है — न किसी अहं से ग्रस्त, न किसी मोह से बंधा, बल्कि एक ऐसे मनुष्य के रूप में जो जीवन के हर परिवर्तन का साक्षी और सहभागी दोनों रहा है।
First Published: Feb 2026